वट सावित्री कथा- ‘एक पतिव्रता स्त्री के संघर्ष की कहानी’
वट सावित्री व्रत जिसे भारत की हर सुहागन महिला अपने पति की लम्बी आयु के लिए रखती है। इस व्रत के पीछे एक कहानी है जो एक स्त्री के समर्पण,बुद्धि और साहस को दर्शाती है। कैसे सावित्री अपनी सूझ-बूझ और समर्पण से विधि के विधान को भी पलट देती है..।
आइये पढ़ते है कहानी और देखते है क्या है इसकी उपासना और व्रत विधि..!
वट सावित्री व्रत की कथा
प्राचीन काल में एक राजा था, जिसके पास सब कुछ था केवल संतान नहीं थी। वो दुखी था की आगे उसका इतना बड़ा राजपाठ सँभालने को कोई उत्तराधिकारी नहीं था।
एक दिन राजा ने विद्वान ज्योतिषों और पुरोहितो को आमंत्रित किया और उनसे अपना यहीं प्रश्न किया कि ‘उसे संतान सुख कब प्राप्त होगा!’
सभी विद्वानों ने राजा की कुंडली देखी और गणना करके सभी एक मत हो इस परिणाम पर पहुंचे की ‘राजन, तुम्हारे यहाँ एक रूपवान,बिद्धिमान और धर्मपरायण पुत्री का जन्म होगा।
राज ये बात सुन कर बड़ा प्रसन्न हुआ लेकिन उसने देखा की ज्योतिष और पुरोहितो के माथे पर चिंता की लकीरे है, राजा ने उनसे कहाँ की ”आप किस कारण चिंता में है !! कृपया मुझे सही सही बताएं और जो भी फलन आपने देखा है उसे मुझसे कहें।”
पुरोहितो ने तब राजा को बताया की ”आपके केवल ये एक ही संतान होगी और जिस युवक से आपकी पुत्री का विवाह होगा उस युवक की विवाह के एक वर्ष बाद ही मृत्यु हो जायेगी। यही विधि का विधान है।”
राजा ये सुन कर बहुत दुखी हुआ और अपने राज्य के भविष्य की चिंता करने लगा।
कुछ वर्ष व्यतीत होने के पश्चात पुरोहितो द्वारा कही बात सत्य सिद्ध हुई और राजा के यहाँ एक सुन्दर रूपवान कन्या ने जन्म लिया, कन्या सूर्य के तेज को धारण किये हुए थी इसीलिए उसका नाम रखा गया ‘सावित्री’।
अब जैसे-जैसे सावित्री धीरे-धीरे बड़ी हो रही थी वैसे-वैसे ही राजा की चिंता बढती जा रही थी। और एक दिन सावित्री विवाह योग्य हो गयी और राजा उसके विवाह की भविष्वाणी को लेकर बहुत ही दुखी रहने लगा।
राजा ने एक दिन बहुत ही दुखी अवस्था में बैठे अपने आराध्य को स्मरण कर रहे थे तभी राजा के पास नारद मुनि जी आ गये। नारद ने राजा को दुखी देख कर दुःख का कारण पूछा तो राजा ने अपनी सारी व्यथा नारद जी को कह सुनाई।
तब नारद जी ने राजा से कहा कि ”हे राजन, विधि का विधान तो अटल है इसीलिए तुम अपनी पुत्री के विवाह का दायित्व उसी पर छोड़ दो और अपनी पुत्री से कहो की वो अपने लिए योग्य वर स्वयं ही ढूंढ ले।” इतना कह कर नारद मुनि वहां से अंतर्ध्यान हो गये।
राजा ने नारद मुनि की सारी बाते अपनी पुत्री सावित्री को बताई और कहाँ ”ये पुत्री तुम्हारा इस पर क्या विचार है!” तो सावित्री ने कहाँ ”हे पिताश्री मैं नारद जी की आज्ञा का पालन करुँगी, आप निन्श्चित रहे, मैं अपने लिए किसी योग्य वर का ही चुनाव करुँगी।”
राजपुत्री सावित्री अपनी सखी-सहेलियों , दास दासियों और अनुचरो सहित अपने लिए योग्य पति की खोज में निकल पड़ी। सावित्री अनेक नगरो, गाँवो, प्रान्तों में गई लेकिन उसे कोई योग्य वर नहीं मिला।
एक दिन सावित्री का रथ यात्रा करता हुआ एक वन से निकल रहा था, वन बहुत सुन्दर और रमणीय था तो सावित्री ने अपना रथ उस वन में रुकवा दिया और रथ से उतर कर वन का प्राकृतिक सौन्दर्य निहारते हुए वन विचरण करने लगी, तभी उसकी दृष्टि एक एक वृक्ष की दाल पर कुल्हाड़ी से लकड़ी काटते एक युवक पर पड़ी, युवक सुन्दर, बलिष्ठ और गौर वर्ण का दिखाई पड़ रहा था। सावित्री उस युवक के चेहरे के भाव, मुखाकृति, स्वभाव और युवक के मौन का अध्यन करती रही, युवक कितनी कुशलता से और लगन से अपना कार्य कर रहा था। सावित्री उस युवक के ध्यान से बहार आई और अपने अनुचरो से उस युवक को बुलावा भेजा।
सावित्री द्वारा बुलावा भेजने पर सत्यवान सावित्री के पास पहुंचा और अपना परिचय देते बोला ”हे राजकुमारी मैं एक दरिद्रता से प्रभावित कुलीन युवक हूँ, इसी जंगल में रहता हूँ अपने अंधे माता पिता के साथ और वनों में लकड़ियाँ काट कर उसे बेच कर अपना और अपने माता पिता का जीवन निर्वहन करता हूँ, कहिये मैं आपकी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ !”
सत्यवान की शिष्टता,शालीनता और स्पष्टवादिता से सावित्री बहुत प्रभावित हुई, उसके गुणों से प्रभावित हो कर उसने सत्यवान से विवाह का निर्णय लिया और निर्णय लेते ही विनम्रतापूर्वक सत्यवान के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रख दिया।
सावित्री का प्रस्ताव सुनकर सत्यवान ने बड़े ही कोमल और नम्र स्वर में कहाँ ”हे राजकुमारी,, मेरे साथ विवाह करना आपके लिए उचित नहीं है, आपको मेरी तरह दुखो और कष्टों का सामना करना पड़ेगा।’‘
लेकिन सावित्री नहीं मानी और बार बार विवाह का आग्रह करने लगी,, इस पर सत्यवान ने कहा की इसके लिए आपको मेरी माता-पिता से बात करनी होगी जो की पास ही एक कुटिया में रहते है। सत्यवान के प्रस्ताव से सावित्री उत्साहित हो सत्यवान की कुटिया में पहुंची और सत्यवान के माता-पिता से उसने विवाह की बात की, इस पर सत्यवान के अंधे माता-पिता ने भी सावित्री को बहुत समझाया की सत्यवान से विवाह के पश्चात तुम संकट में घिर जाओगी, लेकिन सावित्री ने उनकी भी एक ना मानी और कई प्रकार के आश्वासन दे कर सत्यवान के माता-पिता से सत्यवान से विवाह की अनुमति ले ली।
सत्यवान की कुटिया से लौट कर सावित्री ने अपने पिता को सारा वृतांत बताया, सावित्री अपने पिता से बात कर ही रही थी की तभी नारद मुनि वहां आ पहुंचे। नारद जी ने सवित्री से पूछा की ”हे पुत्री,मने अपना वर किसे चुना है !’‘ तो सावित्री ने नारद जी को भी सारी बात कह दी। ये सुन कर नारद जी सावित्री से बोले की ”इसमें कोई शंका नहीं की सत्यवान एक रूपवान, बलवान, सदाचारी, सज्जन और गुणी युवक है, परन्तु विवाह के एक वर्ष पश्चात ही सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी। इसीलिए सावित्री तुम अपने लिए किसी और वर का चुनाव करो, सत्यवान तो अल्पायु है।”
नारद जी की बात सुनकर सावित्री बोली ”हे नारद जी, मैं देव भय से धर्म से विमुख नहीं हो सकती, आर्य नारी जीवन में एक ही बार अपने पति का चुनाव करती है और मैं सत्यवान को अपना पति चुन चुकी हूँ, अतः अब मैं अपने वचन और धर्म को भंग कर पाप नहीं करुँगी।”
नारद मुनि और सावित्री के पिता ने हर प्रकार से सावित्री को समझाने का प्रयत्न किया, लेकिन सावित्री सत्यवान से विवाह के अपने वचन और निर्णय पर दृढ रही। इस पर नारद मुनि ने सावित्री को कहाँ– ‘‘तुम्हारा कल्याण हो और तुम्हारा जीवन सुखी हो..।” ऐसा आशीर्वाद दे नारद मुनि वहां से विदा लेकर चले गये।
सावित्री की इच्छानुसार उसके पिता ने सावित्री का विवाह सत्यवान के साथ करवा दिया। सावित्री को ज्ञात था की विवाह से एक वर्ष पश्चात सत्यवान की मृत्यु हो जाएगी, ऐसे में उसने सोचा की क्यूँ का भगवान् भोलेनाथ को प्रसन्न कर लिया जाए, क्यूंकि अगर शिव प्रसन्न हो गए तो विधि के विधान को भी परिवर्तित किया जा सकता है- ‘मैंटहि कठिन कुअंकभाल के, भाविहु मेट सकहिं त्रिपुरारी।’ अर्थार्थ- शंकर जी में ही वो शक्ति है जो विधि के विधान को भी बदल सकते है।
अतः सब प्रकार से निश्चय कर सावित्री भक्ति पूर्वक भगवान् शंकर की अराधना करने लगी। सत्यवान के लिए सावित्री पूर्ण मनोयोग से शिव जी की आराधना करती रही। जब सत्यवान की आयु के केवल सात दिन शेष रह गए तो सावित्री और तीव्रता से कठिन व्रत-उपवास कर भगवान् शंकर को प्रसन्न करने लग गयी।
अंततः सावित्री की भक्ति से प्रसन्न हो कर भगवन शिव सावित्री के समक्ष प्रकट हुए और बोले ”हे पुत्री, मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ, मुझसे मनोवांछित वरदान मांग लो।”
सावित्री भगवान् शिव के समक्ष हाथ जोड़ खड़ी हो गयी और बोली ”हे प्रभु, मेरे पति की आयु के मात्र दो दिवस ही शेष बचे है, उनके जीवन की रक्षा करें।”
इस पर शिव जी बोले- ”कल ज्येष्ठ की अमावस्या है, इस दिन तुम भक्ति भाव से वट वृक्ष की पूजा करो और व्रत करो, तुम्हारी मनोकामना अवश्य ही पूर्ण होगी।”
सावित्री ने अगले दिन प्रातः उठकर वट वृक्ष की भक्ति पूर्वक पूजा की और पूरे दिन व्रत रखा और पूरी रात जागरण किया।
उससे अगले दिन सत्यवान की आयु का अंतिम दिन था, प्रातःकाल जब सत्यवान जंगल में लकड़ियाँ काटने जाने लगा तो सावित्री भी उसके साथ जाने की हठ करने लगी। किसी प्रकार सावित्री ने अपने सास-ससुर को राजी कर लिया और अपने पति को भी मना लिया और सत्यवान के साथ वन में स्वयं भी चली गई।
सत्यवान वन पहुँच कर एक वृक्ष पर चढ़ा और जैसे ही वो उस वृक्ष की डाल काटने के लिए कुल्हाड़ी चलाता है उसके सर में दर्द होने लगता है। सत्यवान दर्द के कारण वृक्ष पर से नीचे उतर आता है और सावित्री से बोलता है -”प्रिये मेरे सर में बहुत ही पीढ़ा हो रही है,मैं थोड़ी देर विश्राम करना चाहता हूँ।”
पतिव्रता सावित्री चिंतित होने लगी और अपने अराध्य का ध्यान करने लगी। सत्यवान कुछ ही देर में मूर्छित होकर अचेत हो गया। तभी सावित्री ने अपने सम्मुख एक दिव्य पुरुष को देखा, उस दिव्य पुरुष को देख कर सावित्री ने पूछा की ”आप कौन है!” वो दिव्य पुरुष आश्चर्यचकित हुआ और पूछा की ”क्या मैं तुम्हारे को दिखाई पड़ रहा हूँ !” इस पर सावित्री ने उत्तर दिया ”हाँ, लेकिन आप है कौन !!” इस पर वह दिव्य पुरुष बोला-”मैं धर्मराज यमराज हूँ, तुम्हारे पति की आयु समाप्त हो चुकी है, और मैं इसके प्राण लेने आया हूँ।” अपनी बात कह धर्मराज सावित्री की गोद में अचेत पड़े सत्यवान के प्राण ले कर प्रस्थान करने लगे, और सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ी।
सावित्री को पीछे आता देख धर्मराज ने पूछा- ”तुम पीछे क्यूँ आ रही हो पुत्री, जाओ घर लौट जाओ।”
इस पर सावित्री बोली-” कृपया कर के मुझे भी साथ ले जाओ।”
धर्मराज बोले ”अभी तुम्हारी आयु शेष है और मैं तुम्हे अपने साथ नहीं ले जा सकता, अब वापस लौट जाओ।”
इतना कह यमराज आगे बढ़ने लगे और सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। धर्मराज ने फिर देखा की सावित्री उनके पीछे अब भी आ रही है इस पर उन्होंने सावित्री को फिर से घर लौट जाने को कहाँ, लेकिन सावित्री नहीं मानी। धर्मराज ने सावित्री को बार बार समझाया की तुम यहाँ से जाओ, यमपुरी के नियमो के अनुसार तुम साथ नहीं चल सकती, लेकिन सावित्री मानने को तैयार नहीं थी, वो बार बार कह रही थी की ”या तो मुझे भी साथ ले चलो या मेरे पति के प्राण वापस दे दो।”
सावित्री के पीछे आने से धर्मराज क्रोधित भी थे और विचलित भी हो रहे थे, क्यूंकि पतिव्रता नारी का तेज सूर्य के सामान होता है अतः वो उस पर क्रोधित भी नहीं होना चाहते थे, इसीलिए धर्मराज ने सावित्री से पीछा छुड़ाने के लिए कोई वरदान मांगने को कहाँ तो सावित्री ने वरदान माँगा की ‘उसके सास-ससुर का खोया साम्राज्य उन्हें वापस मिल जाए।’ धर्मराज ने तथास्तु कहा और आगे बढ़ने लगे। लेकिन वो क्या देखते है की सावित्री अभी भी उनके पीछे आ रही है तो यमराज बोले ‘‘अब क्यूँ पीछे आ रही हो चाहे तो एक और वर मांग लो!” इस पर सावित्री बोली ”मेरे सास-ससुर तो अंधे है वो बिना आँखों से राजपाठ कैसे संभालेंगे! अतः मुझे वरदान में यह दीजिये की उन दोनों की नेत्र ज्योति वापस आ जाए।” यमराज बोले तथास्तु और आगे बढ़ने लगे।
उन्होंने पुनः देखा की सावित्री अभी भी उनके पीछे पीछे आ रही है, अतः अब वो अधिक क्रोधित हो गए और क्रोध में बोले की ”एक और वर मांग लो चाहे लेकिन अब पीछे मत आना और ये तुम्हारा अंतिम वरदान होगा।”
सावित्री ने वर माँगा-”हे धर्मराज मुझे वरदान दीजिये की मैं पुत्रवती हो जाऊं।” धर्मराज ने तुरंत ही बोल दिया तथास्तु। और शीघ्रता कर आगे बढ़ने लगे, और थोड़ी दूर चलने पर उन्होंने देखा की सावित्री अभी भी उनके पीछे आ रही है। अब वो और अधिक क्रोधित हो गये और बोले ”मैंने तुम्हे तीनो वरदान दे दिए है फिर तुम क्यूँ मेरे पीछे आ रही हो !”
इस पर सावित्री बोली –‘हे धर्मराज, आपने मुझे पुत्रवती होने का वरदान दे दिया, फिर भी आप मेरे पति के प्राणों को लेके जा रहे है! मैं पतिव्रता नारी हूँ बिना पति के कैसे मैं पुत्रवती बनूँगी !!”
सावित्री का तर्क सुन कर और वरदान देने की त्रुटी को अनुभव कर वो आश्चर्यचकित हुए, फिर संयमित होकर बोले- ”सावित्री बड़ी ही चतुरता से तूने मुझे धर्म संकट में डाला है, अब जाओ मेरा वरदान असत्य नहीं होगा। अपने पति के पास जाओ, तुम्हारे पास जाते ही सत्यवान पुनः जीवित हो उठेगा।”
इतना सुन सावित्री धर्मराज को प्रणाम और धन्यवाद कर वापस अपने पति के पास लौट आई। सावित्री के पास जाते ही सत्यवान जीवित हो उठा, और दोनों प्रसन्न हो घर लौट आये।
कुछ समय पश्चात् धर्मराज के दोनों वरदान भी पूरे हो गए, सावित्री के सास-ससुर को दिखाई देने लगा और उनका राज्य भी उन्हें वापस मिल गया।
सावित्री के द्वारा प्रथमबार वट की पूजा और व्रत करने के कारण इस व्रत का नाम वट सावित्री व्रत पड़ा।
और जो भी सुहागन स्त्री इस व्रत को करती है उसके पति को लम्बी आयु मिलती है और परिवार में सुख-संपत्ति का वास होता है।
वट सावित्री व्रत की पूजा विधि।
वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। इस दिन बरगद के वृक्ष की पूजा की जाती है। यह व्रत केवल सुहागन स्त्रियों के लिए होता है। यह व्रत करवाचौथ के बाद सुहागन स्त्रियों के लिए अत्यंत लोकप्रिय व्रत है।
मान्यता है की इस व्रत को जो स्त्री पूरी निष्ठा से करती है उसके पति की आकाल मृत्यु नहीं होती और स्त्री को सुहागन रहने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। सुख-सैभाग्य, धन-धान्य और पति के प्रेम का सुख भी स्त्री को प्राप्त होता है।
वट सावित्री व्रत के दिन विवाहित सुहागन स्त्रियाँ पूरे दिन व्रत रखती है, व्रत का विधिनुसार पूजन किये बिना स्त्री जल भी ग्रहण नहीं करती है। यह व्रत मृत्यु के देवता धर्मराज का व्रत है।
विवाहित स्त्रियाँ प्रातः काल स्नान आदि कर नए वस्त्र और आभूषण इत्यादि धारण कर सर्वप्रथम पूजन की सामग्री तैयार करती है। पूड़ी,हलवा,आटे में शहद, गुड या चीनी डाल कर वट वृक्ष के फल के आकार की गोलिया बना कर उसे घी में सेक लेती है, फिर इन मीठी गोलियो(पूए) को सूत के धागे में पिरोकर माला बनाती है। उसके बाद शुद्ध थाल(थाली) में पूजा की सामग्री जैसे भोग के मिष्ठान पकवान सजाकर रख लेती है। इसमें शुद्ध जल का कलश, चावल, कुमकुम,घी,भीगे चने, गुड़, हल्दी,रोली, और कच्चा धागा इत्यादि सामग्री लेकर बरगद के यानि बड़ के पेड़ की पूजा करने जाती है।
यदि बड़ के वृक्ष तक जाना किसी कारण संभव ना हो तो, उसकी एक टहनी जिसमे पत्तियां और फल हो को मंगा कर उसे एक गमले में लगा कर फिर उसकी पूजा कर सकते है। औरयदि ये भी संभव ना हो तो वट(बरगद) के वृक्ष के चित्र(फोटो) को दीवार पर लगा कर उसके आगे भी पूजन कर सकती है। चित्र आदि के समक्ष पूजन करना व्यावहारिक है क्यूंकि पूजन में श्रृद्धा और विश्वास प्रमुख होते है और इसी से मनवांछित फल प्राप्त होता है। क्यूंकि व्रत में आस्था निष्ठा और विश्वास का बहुत महत्त्व है।
पूजन विधि-
वट वृक्ष की जड़ पर जल चढ़ा कर वृक्ष के तने पर रोली का टीका लगाएं। चने, गुड़, चावल, घी, इत्यादि वृक्ष पर चढ़ाएं। वृक्ष के नीचे घी का दीपक जलाएं। हल्दी से कच्चे सूत के धागे को रंग कर वट वृक्ष में लपेटते हुए सात बार वृक्ष की परिक्रमा की जाती है। वट के वृक्ष के पत्तो की माला पहन कर वट सावित्री की कथा सुनी जाती है।
फिर घर में पकवान बनाया जाता है और पकवान, चना और रुपया आदि रख कर सम्बंधि सुहागन सहेलियों या जेठानी आदि को भिजवाया जाता है। तत्पश्चात व्रत कर्ता स्त्री अपनी सास के चरण स्पर्श कर के उनका आशीर्वाद प्राप्त करती है।